बंजारा समाज का ऐलान: "एक देश, एक जाति, एक कोड" | अभी नहीं तो कभी नहीं!
राष्ट्रीय बंजारा जनआंदोलन की बड़ी मांग: जातिगत जनगणना में बंजारा समाज के लिए अलग 'जाति कोड' अनिवार्य। रामेश्वर ज. राठौड़ की विशेष रिपोर्ट और पोहरादेवी अधिवेशन की जानकारी।
बंजारा समाज की हुंकार: 'जाति कोड नहीं तो जनगणना नहीं', राष्ट्रीय स्तर पर बड़े आंदोलन की तैयारी
विशेष रिपोर्ट: रामेश्वर ज. राठौड़ (भारतीय बंजारा राजनीति संशोधक)
नई दिल्ली/पोहरादेवी: भारतीय बंजारा समाज ने केंद्र सरकार के समक्ष अपनी अस्तित्व की लड़ाई को तेज करते हुए एक स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। 'राष्ट्रीय बंजारा जनआंदोलन' के बैनर तले समाज ने मांग की है कि आगामी राष्ट्रीय जनगणना में बंजारा समाज के लिए एक विशिष्ट 'जाति कोड' आवंटित किया जाए। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर बंजारा जाति का कोड निर्धारित नहीं किया गया, तो पूरे देश में जातिगत जनगणना का पुरजोर विरोध किया जाएगा।
इतिहास के झरोखे से: गौरव और दमन की गाथा
बंजारा समाज का इतिहास भारत की रक्षा और संस्कृति के संरक्षण के लिए दिए गए बलिदानों से भरा है। हजारों वर्षों से यह समाज मातृभूमि के लिए समर्पित रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में इस समुदाय के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। यही कारण था कि ब्रिटिश हुकूमत बंजारा समाज को अपने शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा मानती थी।
अंग्रेजों ने इस समाज की शक्ति को कुचलने के लिए दमनकारी नीतियों का सहारा लिया। 1870 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी टी.वी. स्टीफनी ने बंजारा समाज को रोकने के लिए एक कानून का प्रस्ताव रखा। इसके बाद, 12 अक्टूबर 1871 को 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' (Criminal Tribes Act) पारित किया गया। इस काले कानून के तहत एक स्वाभिमानी और राष्ट्रभक्त समाज को 'जन्मजात अपराधी' घोषित कर दिया गया। जेम्स फिट्रजेम्स स्टीफन जैसे दार्शनिकों ने समाज के प्रति अत्यंत अपमानजनक टिप्पणियां कीं, जिससे बंजारा समाज का जीवन नर्क समान बना दिया गया। आजादी के इतने वर्षों बाद भी, उस ऐतिहासिक अन्याय के निशान आज भी समाज की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर दिखाई देते हैं।
'एक देश, एक जाति, एक कोड' की आवश्यकता क्यों?
वर्तमान में बंजारा समाज पूरे भारत में निवास करता है, लेकिन विडंबना यह है कि अलग-अलग राज्यों में इस समाज की पहचान और आरक्षण की श्रेणी अलग-अलग है।
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आरक्षण का बिखराव: कहीं यह समाज अनुसूचित जनजाति (ST) में है, कहीं अनुसूचित जाति (SC), तो कहीं अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या सामान्य श्रेणी में शामिल है।
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बहुलता की अनदेखी: अलग-अलग श्रेणियों और नामों (जैसे लबाना, लमाण, नायक आदि) में बंटे होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर बंजारा समाज की वास्तविक जनसंख्या और 'Majority' (बहुलता) स्पष्ट नहीं हो पाती।
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डेटा का अभाव: बिना सटीक डेटा के, समाज को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
बंजारा समाज की मांग है कि बिहार सरकार की तर्ज पर केंद्र भी जाति कोड जारी करे। बिहार में जातिगत जनगणना के दौरान 214 जातियों के लिए कोड निर्धारित किए गए थे (जैसे यादव - 165, राजपूत - 169, कुर्मी - 24)। इसी तरह, यदि बंजारा समाज को एक विशिष्ट राष्ट्रीय कोड मिलता है, तो पूरे देश में उनकी गणना एक छतरी के नीचे होगी, जिससे उनकी वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन संभव हो सकेगा।
राजनीतिक और सामाजिक मजबूती का आधार
जातिगत जनगणना केवल गिनती की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के सही बंटवारे का आधार है। बंजारा समाज का मानना है कि 'जाति कोड' उनकी राजनीतिक भागीदारी, शिक्षा में अवसर और सामाजिक ढांचे को मजबूत करने के लिए अनिवार्य है। रामेश्वर ज. राठौड़ के अनुसार, यह समाज के लिए अस्तित्व की आखिरी संधि है— "अभी नहीं तो कभी नहीं।"
पोहरादेवी में होगा राष्ट्रीय अधिवेशन
अपनी मांगों को धार देने के लिए बंजारा समाज अब एक निर्णायक मोड़ पर है। आने वाले दिनों में बंजारा समाज की काशी मानी जाने वाली पोहरादेवी की पावन भूमि पर एक विशाल 'राष्ट्रीय बंजारा अधिवेशन' आयोजित किया जाएगा। इस अधिवेशन में देशभर के बंजारा संगठनों को आमंत्रित किया गया है ताकि सभी राजनीतिक और व्यक्तिगत मतभेद भुलाकर एक सुर में अपनी आवाज बुलंद की जा सके।
निष्कर्ष: अधिकार की लड़ाई
समाज ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब और बंटवारा नहीं चाहते। 'राज्य कोई भी रहे, लिखें सिर्फ बंजारा' के नारे के साथ यह आंदोलन अब सड़कों पर उतरने को तैयार है। केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदया को पहले ही निवेदन दिया जा चुका है। यदि सरकार इस मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं करती है, तो बंजारा समाज राष्ट्रीय स्तर पर जनगणना का बहिष्कार करने और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए विवश होगा।
यह समय समाज के लिए एकजुट होने और अपने गौरवशाली इतिहास को वर्तमान के अधिकारों के साथ जोड़ने का है।
जय सेवालाल! जय वसंत! जय बाबालकीशा!